Friday, 4 September 2015

स्मार्ट सिटी के तौर पर लखनऊ कैसा होगा

जब से लखनऊ स्मार्ट सिटी बनने की बात हुई है तब से लखनऊवासियों में लगातार उत्सुकता बरकरार है, और यह एक बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है कि आखिरकार स्मार्ट सिटी के तौर पर लखनऊ कैसा दिखेगा। क्या-क्या नए बदलाव दिखेंगे, क्या-क्या नयी सुविधाएं होंगी या फिर यहाँ के इंफ्रास्ट्र्क्चर में कितना बदलाव आएगा। किस तरह से उभरती हुई नई चुनौतियों पर शहर कैसे खरा उतरेगा। 
लखनऊ को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखें तो लगभग 250 साल पहले से शहरीकरण होना शुरू हो चुका था । तब से ही शहर में, मूलभूत सुविधाओं को लेकर एक बेहतर व्यस्था थी, उस जमाने में ही सीवर व ड्रेनेज़ सिस्टम की उत्तम व्यस्था थी। उस समय शहरी यातायात व स्वास्थ्य संबंधी सेवाएँ की समुचित व्यस्था हुआ करती थी। चिकन व जरदोज़ी का बड़े पैमाने पर काम हुआ करता था, जिससे लोगों के पास रोजगार की बेहतर सुविधाएं मौजूद थी। उस समय का नवाबी आर्किटेक्ट आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आखिर इतना सब कुछ होने के बाद भीं, आज लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने की आवश्यकता क्यूँ पड़ रही है । जबकि लखनऊ तो पहले से स्मार्ट हुआ करता था, जहां की कला, संस्कृति व परम्पराएँ बहुत पहले से ही समृद्ध हुआ करती थी। जिसकी झलक हमें आज भी देखने को मिलती है।  

लेकिन समय के साथ शहर में काफी बदलाव देखने को मिला। प्रदेश की राजधानी होने कारण बिजली, पानी, स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा की बेहतर सुविधा होने के कारण शहर की तरफ छोटे शहरों व गाँवों से तेजी से माइग्रेशन हुआ। देखते-देखते आज लखनऊ की आबादी 50 लाख से भीं ऊपर हो गयी। हर साल इसमें काफ़ी तेजी से इजाफा हो रहा है।
जिससे शहर के सभी प्रकार मूलभूत संसाधनो पर तेजी से दबाव बढने लगा। जिसके एवज में, शहर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है। जिसने अवैध कालोनियों व झुग्गी-झोपड़ियों को जन्म दिया। सरकार के लगातार प्रयास के बावजूद, जो ढांचागत सुधार होने चाहिए था, वो अब तक नही हो पाया है, फिर भी काफी हद तक सफलता हासिल हुई है। अब इस चीज़ को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है कि शहर को किन-किन मायनों में स्मार्ट बनने की जरूरत है ।
अगर हम बिजली की बात करें तो शहर इस मायने प्रदेश के अन्य शहरों की तुलना में कहीं बेहतर है लेकिन शहर के पुराने इलाकों में कटियाँ-कनेक्सन व जर्जर बिजली खंभों से आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं, जिसमें सुधार की तुरंत आवश्यकता है। जिससे शहर के सभी इलाकों में अबाध रूप चौबीस घंटे बिजली की सप्लाई हो सके।
अगर हम पानी की सुविधा की बात करें तो पता चलता कि शहर के चालीस फ़ीसदी इलाकों में अब तक पानी की सप्लाई की सुविधा नही है, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट व सीवज सिस्टम की बेहतर सुविधा न होने कारण पारिस्थितिक तंत्र पर बुरी तरह से प्रभाव पड रहा है, जिसका अंदाज़ा शहर के बीचों-बीच से बहने वाली गोमती नदी की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है। 
अगर हम साफ-सफाई की बात करें तो आप लखनऊ की सड़कों के किनारे पसरी गंदगी व कालोनियों की दुर्दशा  को देखकर आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिस तहजीब व संस्कृति के रूप में लखनऊ की पहचान हुआ करती थी, वो आज तेजी से धूमिल होती जा रही है। जिसमें लखनऊ के नागरिकों की सबसे बड़ी भूमिका है। यहाँ तब तक कोई उम्मीद नही किया जा सकता है जब तक लोगों में मानसिकता में बदलाव नही आएगा और स्मार्ट सिटी बनने का ख्वाब सिर्फ ख़्वाब बनकर रह जाएगा।  
अगर हम स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की बात करें तो अन्य महानगरों की तुलना में लखनऊ की स्वास्थ्य सेवा काफी बेहतर है। यहाँ पर किंग जार्ज़ मेडिकल कालेज, एस॰ जी॰ पी॰ जी॰ आई॰, राम मनोहर लोहिया, सिविल हास्पिटल, सहारा हास्पिटल व अन्य कई प्राइवेट हास्पिटल व नर्सिंग होम है, जिससे प्रदेश के कई अन्य जिलों से लोग इलाज के लिए आते हैं। जिसका सबसे ज्यादा दबाव सरकारी अस्पतालों पर ज्यादा होता है इसलिए स्मार्ट हेल्थ सर्विसेज के लिए टेक्नोलोजिकल और इंफ्रास्ट्रक्चर तौर काम करने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है।
सुरक्षा के दृष्टिकोण से अगर देखे तो यह अन्य शहरों के तुलना में काफी ज्यादा सेफ है। लखनऊ पुलिस ने टेक्नोलोजिकल के तौर का काफी इंप्रूव किया है। अगर शहर में कोई भी घटना या दुर्घटना होती है तो कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच जाती है। और वहीं लखनऊ पुलिस महिलाओं की सुरक्षा के प्रति काफी सजग है, जिसके लिए मोबाइल पर एप्स व फ्री टोल नंबर की सुविधा उपलब्ध है। पहले की तुलना में सुरक्षातंत्र में काफी स्मार्टनेस आयी है।
शहरी यातायात लखनऊ की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है। एक सर्वे के मुताबिक लखनऊ में लगभग 50 लाख से अधिक वाहन शहर की सड़कों पर चक्कर काट रहें हैं। हर साल इसमें लगभग 80 हज़ार नए वाहन हर साल इसमें बढ़ोत्तरी कर रहें हैं।  अगर यही हालत रहें तो आने वाले समय में शहरी यातायात की स्थिति काफी भयावह हो सकती थी। अर्बन मोबिलिटी की स्थिति में बेहतरी के लिए ई-गवर्नेंस के माध्यम से सुधार किया जा सकता है। आने वाले समय में अर्बन मोबिलटी की बेहतरी के लिए सरकार मेट्रो रेल नेटवर्क व बी॰ आर॰ टी॰ एस॰ की सेवाये लगभग हर बड़े शहरों में प्रदान की जा रही है। खैर बी॰ आर॰ टी॰ स॰ की बस सेवाएँ देश के अन्य शहरों में अब तक ज्यादा सफल नही रही है, लेकिन अहमदाबाद में अब तक सबसे ज्यादा सफल रही है।

लखनऊ में जिस तरह से आबादी बढ़ रही है, और संसधानों को लेकर जो दबाव बन रहा है इससे शहर में  सीवेज व सॉलिड वेस्ट की समस्या बढ़ रही है। फिर भी इसको लेकर सरकार भी काफी सजग है, इसके निवारण के लिए जगह-जगह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के प्लांट लगाए गए हैं। उसमें से ज़्यादातर प्लांट या तो बेकार पड़े है या तो  ठीक से काम नही कर रहें हैं। अगर शहर स्मार्ट-सिटी के तौर देखा जाय तो इसमें इन सब चीजों को सुधार काफी आवश्यकता है, यह सब पब्लिक-प्राइवेट पार्टीसिपेशन के माध्यम से सुधारा जा सकता है।
अगर शहर को स्मार्ट बनाने के लिए जो सबसे ज्यादा जरूरी है कि वह इन्फ्रास्ट्र्क्चर के सुधार की सबसे ज्यादा आवश्यकता है यानि रीयल एस्टेट की टेकनोलोजिकल के तौर पर एक तरह का रिफ़ार्म करने की जरूरत है। आखिर स्मार्ट सिटी बनने की प्रक्रिया में, नयी टेक्नॉलजी के माध्यम मल्टीस्टोरी बिल्डिंग्स, कमर्शियल काम्प्लेक्स, शॉपिंग मॉल व अन्य प्रकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से शहर को स्मार्ट बनाया जा सकता है। आखिर इस तरह के विकास कार्यक्रमों में रीयल स्टेट के क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। लखनऊ को स्मार्ट सिटी के बनने के लिए इन्फार्मेशन व कम्यूनिकेशन टेक्नोलोजी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। यह सब स्मार्ट सिटीजन और स्मार्ट गवर्नेंस के माध्यम से संभव हो सकेगा।

No comments:

Post a Comment